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Thursday, December 31, 2015

भाषा और भाव का अच्छा सामंजस्य

चित्रांश वाघमारे के गीतों में भाषा और भाव का अच्छा सामंजस्य है। बिम्ब और प्रतीक भी उलझाने वाले न होकर सहज ही हैं। अनुभूति के स्तर पर भी चित्रांश जी गहरे हैं पर पारंपरिक वैचारिकी का असर गीतों के प्रभाव को कहीं कहीं कम कर देता है। चित्रांश जी यदि अपनी वैचारिकी को नये समय की जरूरतों के अनुरूप परिवर्तित कर सकें तो निश्चित रूप से उनके गीत उदाहरण बन कर सामने आ सकते हैं। फिर भी कम उम्र में गहरी अनुभूति और शिल्प की मजबूती के लिए हम चित्रांश जी की प्रतिभा को नमन करते हैं।

-रमाकान्त 

गहन अनुभूतियों की छाप


चित्रांश जी के नवगीतों को पढ़कर ऐसा नहीं प्रतीत होता है कि किसी नवोदित कवि की रचनाएँ हैं। उनके नवगीतों में गहन अनुभूतियों की छाप स्पष्ट दृष्टिगोचर है ,विषय विविधता के साथ भाषा,शिल्प व कथ्य में भी नवता  है।निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि इस वय में इतने पुष्ट नवगीतों का सृजन चित्रांश वाघमारे की विशिष्ट प्रतिभा का द्योतक है।भविष्य में आशा है प्रतिभा में और भी निखार आयेगा । वाघमारे को अच्छे सृजन के लिए हार्दिक बधाई तथा ऐसे सशक्त युवा नवगीतकार की रचनाएँ प्रस्तुत करने के लिए भाई दाहिया जी को धन्यवाद।

-विनय भदौरिया

Wednesday, December 30, 2015

चित्रांश के नवगीत

साधुवाद आदरणीय भाई रामकिशोर दाहिया जी, आज आपने कमवयस किन्तु परिपक्व रचनात्मक संसार के धनी प्रिय चित्रांश वाघमारे के नवगीत पटल पर प्रस्तुत कर स्तुत्य कार्य किया । धन्यवाद बंधु । 
विविध विषयों से संदर्भित कथ्यों के ये गीत चित्रांश जी की सोच के फलक की व्यापकता दिखाते हैं । चित्रांश जी जहाँ मनुष्य की अपने ही मन की उलझनों, भटकावों को खँगालते हुए लिखते हैं "बंद खिड़कियों जैसा मन है /अपने ही भटकावों का खुद हमको ही अनुमान नहीं है "
वहीं घर परिवार के लिए श्रम करती हुई भी माँ के बेफिक्र होने को सुन्दर व्यञ्जना से भर देते हैं-
"हँसकर पल भर में ही अम्मा 
सारी फिक्र निचोड़ रही है "
ऐसी ही उल्लेखनीय पंक्तियाँ है "पत्र आया और आँखें 
खोलकर संवाद बोले "
भीड़ में अनुयायियों की 
हो सको शामिल तो ठीक "

है गहन तम पर दियों का 
टिमटिमाना तक मना है "

झेलती है हर कली
अब द्रौपदी सी 
मौसमी दु: शासनों के घाव गहरे "
चित्राश जहाँ बहुत निकट से कथ्य उठाते हैं वहीं सामाजिक असंगतियों पर भी अपनी बात कहते हैं । 
"राम खो गए दंडक वन में 'नवगीत में बहुत प्रभावी रुपक रच कर अद्भुत व्यञ्जना को धार दी गई है । 
एक बहुत ही प्यारा नवगीत है चित्रांश का 
नटनी सी, पतली रस्सी पर 
चलती रहती मेरी माँ 
भरती अपनेपन की मिट्टी 
उभरी हुई दरारों में "
हाँ अन्त में "भूख से टूटी कलम ने छंद गिरवी रख दिए " पर मेरा मानना है कि छंद गिरवी रखने वाले लोग तो गले तक अघाये अफरे लोग थे । निराला से लेकर दिनकर तक किसी ने छंद से समझौता नहीं किया । यद्यपि यह पूरा गीत भी बहुत सुन्दर और प्रभावी है । 
चित्रांश के नवगीतों में ठेठ गीतों की पुष्टता के साथ नवगीतपरक कथ्यात्मकता की सहज स्थिति देखी जा सकती है । परिपूर्ण प्रवाह के साथ नवगीत की चुनौती भरे विषयों पर सहजता से बात कहना ही रचनाकार की सफलता है । बहुत बधाई, शुभाशीष भाई चित्रांश । 

-राजा अवस्थी 

चित्रांश की रचनाये

प्रिय चित्रांश वाघमारे के आठ नवगीत आज समूह पटल पर समीक्षार्थ प्रस्तुत कर श्री दाहिया जी ने संभावनाओं के द्वार पर दस्तक देती ऐसी गीत प्रतिभा को प्रोजेक्ट किया जिसने मात्र बारह वर्ष की उम्र में ही अपनी काव्य प्रतिभा से भोपाल के साहित्यकारों को चौंका दिया था। देखते ही देखते वह भोपाल के गीतकारों का चहेता बन गया और उनमें से कुछ वरिष्ठों का मार्गदर्शन पाकर नवगीत परिदृश्य में अपना प्रमुख स्थान बनाता चला गया। आज देश के मूर्धन्य गीत-नवगीतकारों ने उसके गीतों पर समीक्षात्मक टिप्पणी करते हुए उसकी सराहना की तो मुझे भी हार्दिक प्रसन्नता हो रही है। भोपाल के छंदधर्मी रचनाकार प्रतिमाह किसी रचनाधर्मी के घर गोष्ठी करते हैं जिसमें हर रचना पर चर्चा होती है और रचनाकार को अपनी रचना के परिमार्जन का मौका मिलता है। हर गोष्ठी में चित्रांश की भी भागीदारी रहती है। आज बहुत सार्थक सुझाव सदस्यों ने दिये हैं जिनका अनुसरण करने से निश्चित ही चित्रांश की रचनाये परिष्कृत होंगी। सभी समीक्षा करने वाले सज्जनों  का आभार।

-डा० राम वल्लभ आचार्य

ताज़़गी भरे गीत

पुष्ट भावनात्मक कथ्य और छांदसिकता से समृद्ध, ताज़गीभरे गीतों के लिए चित्रांश वाघमारे को बधाई। चित्रांश मुझसे पूरे पचास वर्ष छोटे हैं, इसलिए उन्हें मेरा आत्मिक शुभाशीष! यह संभावनाशील रचनाकार निश्चय ही गीत-नवगीत का एक प्रमुख भावी हस्ताक्षर है। उनकी रचनाशीलता नित्य प्रति समृद्ध और परिष्कृत होती रहे, यह मेरी मंगल कामना है! उनके गीतों का कथ्य मात्र वैचारिक नहीं अपितु आंतरिक अनुभूति के रूप में पाठक के मन को छूता है, यह उनकी अतिरिक्त विशेषता है! उन्हें पुन: पुन: आशीष!
-डॉ. धनञ्जय सिंह
 मित्रो ! यह मध्यप्रदेश की धरती जिसकी राजधानी भोपाल, यहाँ केवल भोपाली राग गया जाता है।भोपाल से प्रकाशित होने वाली समस्त पत्र-पत्रिकाएं जहाँ नवगीत को ख़ारिज कर, केवल गीत की राग अलापती हों। उनकी दृष्टि में अभी भी आदर. हरिवंशराय बच्चन जी, और आदर.गोपाल दास नीरज से आगे गीत खड़ा ही नहीं हुआ।ऐसे वातावरण में अगर आप चाहें कि अपने नवगीत किसी भोपाल की पत्रिका में प्रकाशन के लिए भेजें तो वहां बैठे संपादक महोदय पहले नव शब्द को अलग करते हैं। फिर गीत प्रकाशित होता है। जहाँ इतनी बड़ी विडम्बना हो।भाई चित्रांश वाघमारे जैसी प्रतिभा अपने आपको बचाए और बनाए रखी।उनके चिंतन और कलम दोनों को नमन करता हूँ।और चर्चा टिप्पणी के लिए इस अद्भुत प्रतिभा को आपके समक्ष प्रस्तुत कर स्वयं गौरवान्वित महसूस करता हूँ।आप सबके आशीर्वचन सुझावात्मक प्रतिक्रियाएं टिप्पणी इस रचनाकार की रचनाधर्मिता पर सादर आमन्त्रित हैं।
आपका ही
वैचारिक मित्र
-रामकिशोर दाहिया
संवेदनात्मक आलोक मंच

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