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Sunday, February 28, 2016

कबीरा बाँच रहा साखी

-बृजनाथ श्रीवास्तव

ओढ़ चदरिया
बीच बजरिया
भर भर कर आँखी
कबीरा बाँच रहा साखी

भरी दुपहरी
घना अंधेरा
गीदड़ बोले जी
जंगल के सब
नाग-नागिनी
केंचुल खोलें जी
भेड़ बकरियाँ
पकड़ जबरिया
माँद-माँद छाकी
कबीरा बाँच रहा साखी

जोग साधते
जोगी-जोगन
अन्तर्ध्यान हुए
किसकी साजिश
चींटी के जो
निकले पंख नए
महल अटरिया
हाथ गगरिया
पोर-पोर चाखी
कबीरा बाँच रहा साखी

षट्कर्मी से
हुईं तिकड़मी
मर्यादा घर की
छूरी मारैं
कसमें बाँचें
भाई के सर की
बुद्धि जठरिया
कोख गठरिया
पकड़-पकड़ राखी
कबीरा बाँच रहा साखी

-बृजनाथ श्रीवास्तव

राधे-राधे बोल भगत

-बृजनाथ श्रीवास्तव
वृन्दावन में
रहना है तो
राधे-राधे बोल भगत

मंदिर-मंदिर
घाट-घाट पर
पंडों की है भीड़
तुम घर बाहर
छोड़कर आये
यहाँ बसाने नीड़
माया मंदिर
की करतूतें
चुपके-चुपके तोल भगत

अपने-अपने
सबके हित हैं
अपने-अपने राग
छोड़ गोपिका
संग कन्हाई
कौन खेलता फाग
यहाँ पुजारी
और देव के
अपने-अपने मोल भगत

मुँह मत खोलो
कुछ न सुनों तुम
रखो बन्द कर आँख
बहुत जानने की
कोशिश में
गिर जाएगी साख
ज्ञान चक्षु की
बन्द खिड़कियाँ
धीरे-धीरे खोल भगत

-बृजनाथ श्रीवास्तव
[नवगीत संग्रह "रथ इधर मोड़िये" से]