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Thursday, February 04, 2016

रतजगा काज़ल

-डा० मालिनी गौतम

समय के बिखरे हुए
हर ओर निर्मम पल

टीसता है मन कि जैसे
सुआ कोई चुभ गया है
ओढ़ पंखों का दुशाला
क्यों हुई गुमसुम बया है
इन सवालों के कहीं
मिलते नहीं हैं हल

एक हांडी आँच पर
सम्बंध पल-पल जाँचती है
अधपके-से सूत्र सब
बैचेन होकर ताकती है
गगन छूने को धुंआँ है
हो रहा बेकल

मोरपंखी ओढ़नी में
संदली कुछ याद महकें
पर, कशीदों में कढ़े
कोयल-पपीहे अब न चहकें
दृगों में ठहरा हुआ है
रतजगा काजल

-डा० मालिनी गौतम

और कितना सो सकेंगे

-डा० मालिनी गौतम

आँज आँखों में तिमिर
हम और कितना सो सकेंगे

रेत पर हम उन निशानों को
नहीं हैं देख पाते
ज्वार जिनको लहर पर रख
मन मुताबिक फेंक जाते
स्वाति-जल को सीप में
ऐसे भला क्या बो सकेंगे

गली, नुक्कड़, गाँव क्या
सब प्रश्न हमसे पूछते हैं
चेतना के पट उठाकर
मौन से सब जूझते हैं
मुस्कराना दूर
हम क्या चैन से कुछ रो सकेंगे

छल-कपट के छन्द रचते
सिर्फ निज सुर के पुजारी
आचरण में दुर्गुणों की
हर तरफ जिनके खुमारी
हो चले मोहरे उन्हीं के
और क्या अब हो सकेंगे

सब हड़पने की अबुझ-सी
प्यास ही सबको लगी है
रात की मत बात करिये
दिन दहाड़े ही ठगी है
प्यास की इस कीच को
क्या हम कभी कुछ धो सकेंगे

-डा० मालिनी गौतम

जूझने का दम

-डा० मालिनी गौतम

इन हक़ीमो में नहीं है
जूझने का दम

व्याधि फैलाने लगी
अपनी जड़ें गहराइयों में
फुनगियों के शीश गिरते
सर्द-गहरी खाइयों में
नब्ज़ गायब है समय की
हाँफता बेदम

रौशनी के कुछ संदेशे लिये
रवि द्वारे खड़ा है
कूचियाँ ले कालिमा की
तम मगर पीछे पड़ा है
दाग सारे वक़्त के मुँह पर
अभी कायम

कान-आँखें, मूँद कर
सेना निरर्थक लड़ रही है
है विवश राजा कि उसकी
चाल उल्टी पड़ रही है
खून से लथपथ समय की आँख
नम बस नम

-डा० मालिनी गौतम

कैसे जले अलाव

-डा० मालिनी गौतम

खुरच-खुरच कर खोद रहा है
वक्त हमारे घाव

यहाँ-वहाँ बिखरी कीलों ने
पंक्चर किये तमाम
कैसे घूमे पहिया कोई
लगे जाम पर जाम
सिग्नल सारे टूटे जब-जब
उन पर बढ़ा दबाव

जंग लगे संदूकों में
अब भी तह हैं कुछ यादें
मगर खोलने से पहले ही
लकवाग्रस्त मुरादें
सम्बंधों पर बर्फ जमी है
कैसे जले अलाव

छप्पर-छानी की जो है सो
बारादरी निढाल
छींटा लगे दूध पर जब-जब
बैठा करे उबाल
सबके अपने ही घुमाव हैं
सबके हैं उलझाव

मखमल के कपड़े पर
थिगड़े जैसा है यह जीवन
कभी यहाँ तो कभी वहाँ से
खुलती जाती सीवन
धागे और सुई में भी अब
कायम हुआ दुराव

-डा० मालिनी गौतम

भोर के उत्सव

-डा० मालिनी गौतम

बन्द आँखों में मचलते
भोर के उत्सव

अपने कांधों पर उठाये
रेशमी कुछ ख़्वाब
ढूँढ़ता वह डिग्रियों के
बल पे अदना जॉब
अर्थियाँ कागज़ की ढोना
कब तलक सम्भव

गाँव बैठा शहर के
द्वारे पसारे हाथ
लौट आयेंगे कभी वो
जिनने छोड़ा साथ
आस कोमल-सी
निगलता स्वार्थ का दानव

हल चलाते सोमला का
मन बड़ा चंचल
ढूँढ़ता वह बादलों में
ख्वाहिशों का जल
बालियाँ गेंहूँ की करती
नींद में कलरव

-डा० मालिनी गौतम

साँस भी जर्जर

-डा० मालिनी गौतम

अब नहीं झरते कलम से
प्रेम के आखर
हर सुबह खटपट पुरानी
घाव-सी रिसती जवानी
नून, लकडी, तेल में ही
साँस की अटकी रवानी
छौंक में उड़ते-बिखरते
भावना के पर

लय कहीं ठिठकी हुई है
राह फिर भटकी हुई है
सफर में दलदल उगे हैं
चाल फिर अटकी हुई है
सर्द सन्नाटे हुए
क्या ताल क्या तरुवर

एक बालक-सी हठीली
धूसरित कुछ, कुछ सजीली
सीढ़ियों पर चढ़ रही है
उम्र सीली हो कि गीली
हो रही है आस बेशक
रेत-सी झर-झर

-डा० मालिनी गौतम

शेष भर हैं

-डा० मालिनी गौतम

काठ-सी संवेदनाएँ
शेष भर हैं
झुर्रियों पर उम्र ने
लिख दी कहानी
काँपते होठों पे बातें
कुछ पुरानी
साँस साँकल
खटखटाती
कह रही है
कब तलक है प्रीत
काया से निभानी
अधपके बालों में
गांठों सी उलझती
कसमसाती कामनाएँ
शेष भर हैं
मुँह अँधेरे
तीर गंगा के नहाती
धार में अपने सभी
सुख-दुःख सिराती
श्वेत-वसना भूल कर
उद्वेग सारे
मन्त्र जीवन-साधना के
बुदबुदाती
बूँद-सी पलकों पर
आकर जो ठहरती
डगमगाती आस्थाएँ
शेष भर हैं

-मालिनी गौतम