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Saturday, January 16, 2016

झांकते बादल मिलेंगे

[ एक ]

हाँ, देखना
इस झील में ही
एक दिन
महकते शतदल खिलेंगे।

आज जल-कुम्भी
भले छायी हुई हो
नीर-निर्मल
सतह पर
काई हुई हो
यत्न कर
इनको हटाओ
और देखो
झाँकते बादल मिलेंगे।

फिर दिखेंगे तैरते
जल में शिकारे
इंद्र-धनुषी रंग वाले
छोर सारे
बाँह में फ़िर
बाँह डाले
इसी जल को
छींटते करतल मिलेंगे।

फिर अजाने,
शंख-ध्वनियां
साथ होंगी
अर्घ्य देती
युगल
छवियां साथ होंगी
फिर तरंगित
पंक्तियों में
दीप अनगिन
डोलते झिल-मिल मिलेंगे।
     
-शैलेन्द्र शर्मा

फेशबुक की दोस्ती

[ दो ]
         
खुली फेसबुक
हुई दोस्ती
''शीला-श्याम" मिले
यौवन की
दहलीज़ों पर थे
द्वार-अनंग खुले।

सोलह की
शीला थी केवल
सत्रह के थे श्याम
'इंटर-नेट'
पर 'चैटिन्ग'
करना मन-भावन
था काम
सच कहते हैं
दूर ढोल के
लगते बोल भले।

धीरे-धीरे
बढी गु-टुर-गूँ
फिज़ां हुई मदमस्त
चाहे-अनचाहे
समाज की
हुई वर्जना ध्वस्त
फिर उडान के
पहले ही
पाँखी के पंख जले।

"आनर-किलिंग"
श्याम के हिस्से
शीला को एकांत
और कोख में ही
"विप्लव" को
किया गया फ़िर शांत
अलग-अलग
साँचे पीढी के
किसमें कौन ढले।
   
-शैलेन्द्र शर्मा

गले में फन्दा

[ तीन ]
       

दस रुपये की
प्यारी गुडिया
"टेडी-बियर"हजार का
कसने लगा
गले में फन्दा
"विश्वग्राम-व्यापार"का।

आलू भरे
पराठे भूले
ज़ीरा डाला छाछ
"पीज़ा-बर्गर"
अच्छे लगते
"कोल्ड-ड्रिंक" के साथ
"स्लाइस-माज़ा"
मन को भाये
आम लगे बेकार का।

चटनी और
मुरब्बे फीके
"सास-जैम" की धूम
लम्बा "पेग"
चढा के डाली
रही नशे में झूम
पानी-पानी
जिसके आगे
झोंका सर्द बयार का।

क्यारी-क्यारी
उगे "कैक्टस"
कमतर हुए गुलाब
लोक-संस्कृति
लगती जैसे
दीमक लगी किताब
भूल गये
 इतिहास पुराना
हम अपने बाज़ार का।

-शैलेन्द्र शर्मा

अलग-अलग पारा

[ चार ]

ठंढ एक-सी पर लड़ने की
अलग-अलग धारा
भीखाराम और भीखू का
अलग-अलग पारा।

भीखाराम शाल ओढे हैं
पास रखा "ब्लोअर"
भीखू के तन पर गंजी है
और फटा नेकर
एक तोन्द पर हाथ फेरता
एक सर्वहारा।

एक तरफ "चियर्स"
कहकर वे
टकराते प्याले
एक तरफ अक्सर पड़ते हैं
रोटी के लाले
खुले आसमां के नीचे
करना पडे गुज़ारा।

भीखाराम के नाती-पोते
पहुँच गये "औली"
पिट्ठू बना संग में भीखू
लादे है झोली
हिमघाटी में जमा बर्फ-सा
बे-बस  बंजारा।

मनु के बेटे हैं सारे ही
कहती है पोथी
और जले
पर नमक छिड़कती
राजनीति थोथी
सभागार में उछल रहा है
समता का नारा।

-शैलेन्द्र शर्मा

राम भरोसे देख रहे हैं

[ पांच ]

ज़र्ज़र लेकिन
रंगी-पुती है
चौखम्भे पर टिकी इमारत।

चारों खम्भे हैं
बड़बोले
चारों के चारों अलबेले
अपने-अपने
गाल बजाकर
फेंक रहे औरों पर ढेले
देखो,
इनके चेहरे देखो
समय आ गया पढ़ो इबारत।

हर खम्भे का
सीना चौडा
दरपन से अपना मुँह मोड़ा
अलग-अलग
व्यौरा है सबका
झूठा ज्यादा सच्चा थोड़ा
क़दमताल पर
चलना था, पर
अपनी-अपनी करें क़वायद।

जब जी चाहे
रंग बदल दें
जब जी चाहे ढंग बदल दें
खुद चेहरे पर
लगा मुखौटा
जिस पर चाहें कालिख
मल दें
राम भरोसे
देख रहे हैं
लोकतंत्र की यही रवायत।

-शैलेन्द्र शर्मा

नई सदी का गाँव

[ छः ]

नई सदी में
ढूँढ़ रहा मन
गई सदी का गाँव।

बड़ी ललक के
साथ गया था देखूँ
वह बरगद
जिसके
नीचे जेठ-दुपहरी
रहती थी गद-गद
नाम-निशान
नहीं बरगद का
दिखी कहीं ना छाँव।

बट समीप ही
पनघट
जिसका
था मीठा पानी
पीकर तृप्त
सभी होते थे
तुलसी-रहमानी
वह भी चौरस
पटा पड़ा था
हुआ सुठांव, कुठांव।

ताल-तलैय्ये, खेत-
झोपडों में तब्दील हुए
खोज रहे बच्चे
किताब में
नीम और महुए
शहर गाँव में
आया कैसे
चुपके-चुपके पाँव।

महक खो
गई है रिश्तों की
बैठक है सूनी
देर नहीं
लगती घट जाती
पल में अनहोनी
घर-घर हैं
शकुनी के पाँसे
अपने-अपने दाँव।

-शैलेन्द्र शर्मा

भीतर के सन्नाटे

[ सात ]
   
   
ऊँची-ऊँची मीनारों में
बौने-बौने घर
तन तो छत के
नीचे रहता
मन भटके दर-दर।

बाहर से दिखते हैं जैसे
कोई राजमहल
पर भीतर के सन्नाटे से
जी है रहा दहल
घर में रहते हुए सैकडों
रहते हैं बे-घर।

वैसे तो सारी सुविधायें
हैं मीनारों में
लेकिन तंगी रहती है
घर-घर दीवारों में
जीवन सहज
नहीं फ़िर भी कुछ
उड़ते हैं बे-पर।

'ऊँच निवास
नीच करतूती'
दिखती है अक्सर
गुरबत रह-रह
जिसके आगे
पकडे अपना सर
मानवता
पर हावी पशुता-के
चुभते नश्तर।
   
-शैलेन्द्र शर्मा

रामजियावन

[ आठ ]


रामजियावन बाँच रहे हैं
रामचरित मानस।

"होइहैं सो
जो राम रचि राखा
को करि तरक बढावहिं साखा"
बचपन से
पचपन तक पहुँचे
रटी यही जीवन परिभाषा
आँख खुली
तो नथने फूले
फड़क रही नस-नस

"ढोल-गवाँर-
सूद्र-पसु-नारी
सकल ताड़ना के अधिकारी"
राजतंत्र से
लोकतंत्र तक
उक्ति शोषितों पर यह भारी
तीर वही हैं
वही निशाने
बदला है तरकश।

"राम-कथा
सुंदर करतारी
संसय-विंहग उडावन हारी"
कलजुग में
त्रेता की गाथा
कितनी सच है, हे त्रिपुरारी
संशय के
इस मकड़जाल में
जकड़ रहे बरबस।

-शैलेन्द्र शर्मा