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Tuesday, January 12, 2016

समय कुछ कह रहा है

[ एक ]

आदमी
अन्याय कब से
सह रहा है
कर गुजरने को
समय कुछ कह रहा है।

बन्द है वह-
जंग खाई आलमारी
कैद होकर रह गई
किस्मत हमारी
लग रहीं बेकार अब
सारी दलीलें
अब तो पानी
सर के ऊपर बह रहा है।

हो चुकीं
कितनी कवायद,
कदम तालें
हो न पायीं
दिये की वारिस मशालें
दुधमुहाँ बच्चा
पकड़ता पाँव बरबस
क्यों न उसकी
बाँह कोई गह रहा है।

धूप छनकर
सीखचों में आ रही है
जंगली चिड़िया
प्रभाती गा रही है
झोपड़ों के बीच
जो तनकर खड़ा था
दुर्ग का वह
आज गुम्बद ढह रहा है।

-डा० रविशंकर पाण्डेय

टोटके बहुत जरुरी हैं

[ दो ]


मुँह में तो है राम-राम
पर लिये बगल में छूरी हैं
राम भरोसे के खातिर
कुछ टोटके बहुत जरुरी हैं।

रंग बिरंगे सपने उनके
कलफ़ चढ़ी पोशाकें हैं
मगर सैकड़ों साँप उन्हीं के
अस्तीनों से झाँके हैं
फ्रेम जड़े गाँधी भी चुप हैं
यह कैसी मजबूरी है।

संसद तो खो गई बहस में
चौपालें अफवाहों में
दिल्ली खोने को आतुर है
गोरी-गोरी बाँहों में
जन-गण-मन
अधिनायक वाली
यह तस्वीर अधूरी है।

खैनी-बीड़ी पर कटती है
कैसे सारी रात यहाँ
चटखारों के बीच भुखमरी
पर होती है बात वहाँ
ढाई कोस चले नौ दिन में
पड़ी समूची दूरी है।

-डा० रविशंकर पाण्डेय

रोयें दहाड़ के

[ तीन ]

सावन सूखे
भरे न भादों
बहके-बहके
दिन अषाढ़ के
भाग्य हमारा रहे बाँचते
मौसम-
सूखे और बाढ़ के।

पार साल बूड़े उतराये
आसों-
सूखे की चपेट में
कमर एक ने
पहले तोड़ी
दूजा मारे लात पेट में
फिर भी
बोते रहे खेत हम
सस्ता मँहगा मूस-काढ़ के।

मौसम
धोखेबाज बहुत है
इसका कैसे करें भरोसा
खडी फसल की
बर्बादी-
ज्यों खिसक गया हो
थाल परोसा
औंधी कोठली और
बखारी
क्या रखते
हम का-माड़ के !

समय चक्र के
उलट-फेर में
यह कैसा अँधेर हो गया
कल तक जो
चेरापूँजी था
अब तो जैसलमेर हो गया
काँटा तक न
चुभा हो जिसके
वह क्या जाने दर्द दाढ़ के।

-डा० रविशंकर पाण्डेय

बैठे ठाले

[ चार ]

बासी कढ़ी
बता कर ताज़ी
छोंक-छाँक कर मिर्च मसाले
गरमा-गरम
परोस रहे हैं
ये अपने सालों के साले।

नून तेल की
क्या चिंता जब
चूल्हा जले न इनके घर में
अपनी रोटी
सेंक रहे ये
घूम टहल कर टोले भर में
अब कोठार की
जगह इन्हीं के
मुँह में जड़ना होगा ताले।

बार-बार
जलते चूल्हे में
हांड़ी इनकी चढ़े काठ की
इच्छा भोजन
जीम रहे ये
लगे छदाम न एक गाँठ की
पितर पक्ष में
बन बैठे हैं
पूजनीय सब कौवे काले।

सूखे और
बाढ़ से चौपट
अपनी खेती सोलह आने
दाना एक
नहीं है घर में
अम्मा फिर क्या चली भुनाने
राज रोग
हर साल लग रहा
अपने घर अब बैठे ठाले।

-डा० रविशंकर पाण्डेय

एक छलावा है

[ पाँच ]

नई सदी में
नई सोच का
कैसा दावा है ?
बोतल नई शराब पुरानी
एक छलावा है
भूख बेबसी की
चेहरों पर
परतें जमी हुई
दरवाजे तक
आकर कोई
आहट थमी हुई
ज्यों सुरंग में
एक रोशनी
भूल-भुलावा है।

घिसे पिटे शब्दों के
सारे अर्थ
पुराने हैं
सही चोट को
सही अर्थ में
शब्दों से पाने हैं
सही समय पर
हमें बोलना
होगा धावा है।

क्या होगा
मौसम के इन
थोथे बदलावों से
जब तक क्रांति
न चलकर आए
नंगे पाँवों से
बाहर जमी बर्फ
अंदर तो
पिघला लावा है।

सपने नए
संजोये थी जो
अपनी आँखों में
वह पीढ़ी
सर फोड़ रही है
बन्द सलाखों मे
रंग-बिरंगी
चकाचौंध
बस एक दिखावा है।

-डा० रविशंकर पाण्डेय

नुक़्ता चीनी है

[ छः ]

बात-बात पर
मीन मेख है
नुक्ता चीनी है
यह विरोध लगता
बेमानी महज मशीनी है
सदियों से
अत्याचारों को
सहते आए थे
हाँ जू- हाँ जू
ठकुर सुहाती
कहते आए थे
प्रायश्चित की
वही ज़िन्दगी
हमें न जीनी है।

राज पाट मिल गये
न जाने
कितने माटी में
लेकिन हम
जीवित परम्परा में
परिपाटी में
सुन लो गुन लो
एक हकीकत
यही ज़मीनी है।

गाडी कभी
नाव में थी,
अब नाव है
गाड़ी में
दुखी वही दिखते
तिनके हैं
जिनकी दाढ़ी में
कड़वी है यह दवा
मगर अब
सबको पीनी है।
   
-डा० रविशंकर पाण्डेय

साख हमारी

[ सात ]

कल तक जो थी
साख हमारी
रत्ती भर वह आज नही है
लाठी है
लेकिन लाठी में
अब वैसी
आवाज नही है
कद्दू छूरी पर गिरता है
या कद्दू पर
गिरती छूरी
कटना कद्दू को
पड़ता है यह
गरीब की है मजबूरी
हाकिम है
लेकिन हाकिम का
अब वैसा अंदाज़ नही है।

ऐसा नहीं
कभी पहले भी
नहीं हुई थी कोई चोरी
चोरी नहीं
डकैती है अब
ऊपर से है सीनाज़ोरी
पानी-सा
मर गया हमारा
अब हमको कुछ लाज
नही है।

वेसे तो
भर दिखने में
मौसम
लगता खुशगवार है
लेकिन अंदर
घुटन बहुत है
घटाटोप है अंधकार है
सब कुछ बदला
पर मौसम का
बदला हुआ मिज़ाज़ नही है।

-डा० रविशंकर पाण्डेय

तुम्हें देखकर

[ आठ ]

तुम्हें देखकर
मन में जैसे
एक
महाभारत होता है !

तुम चलती हो
एक हंसिनी
सँभल-सँभल-ज्यों
डग भरती है
पारिजात की
टहनी जैसे
हल्की जुम्बिश से
झरती है
बँधी झील के
जल में कोई
ज्यों बरबस लहरें
बोता है।

घर -आँगन में
बिखर गई तुम
ज्यों गेंदे
की पीली पंखुरी
अथवा छिड़क
गया है कोई
अक्षत हल्दी भर-भर
अंजुरी
पावन-पावन
जैसे कोई
गंगा जल से घर
धोता है।

तुम्हें देखकर
लगा कि कोई
इंद्रजाल
का मन्त्र पढ़ गया
ज्यों कबीर की
काली कामर, पर
केशव का रंग चढ़
गया
तेरे रूप कुंड पर
दिन भर
लगा रहा मन क्यों
गोता है।

-डा० रविशंकर पाण्डेय