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Sunday, February 28, 2016

मजबूरी है

-रामकिशोर दाहिया
मजबूरी है
कविता लिखना
कलम बाँध कर लाठी से

लाठी देख
बँदरिया नाचे
अपना मालिक चीन्हे-जानें
रबर-सरीखे
लक्ष्य अकड़ को
जोर लगाकर खींचे-तानें
दंद-फंद को
बाहर करने
भिड़ा हुआ हूँ कद-काठी से

संवेदन को
जीना होगा
तोड़ रही दम आशा छोटी
शक्ल आदमी की
है लेकिन
खून पिये औ' छीने रोटी
सुअर खाल पर
शब्द व्यंजना
ताकतवर हो तन माटी से

दूध-मलाई
मक्खन खाते, जिसकी
लाठी भैंस उसी की
फ़कत सिपाही
रहे कलम के, किये
नहीं कम पीर किसी की
बेहतर अलग
हो जाना चाहूँ
निर्बल की परपाटी से
     
-रामकिशोर दाहिया

रस की रीत लिखे

-रामकिशोर दाहिया

बिंदिया, कँगना,
पायल, बिछुआ,
प्रणय अतीत लिखे
फूलों की पंखुरियों पर
फागुन ने गीत लिखे

रंगों की मादकता उस पर
छन्दों के अनुबन्ध
कहने को आतुर हैं
अपने-अपनों के सम्बंध
पत्र-प्रेयसी को चोरी से
ज्यों मनमीत लिखे

भौंरों की अनुगूँज फूल के
कानों में अनुप्रास
भीतर-भीतर लगा कसकने
मदिराया मधुमास
मन-आँगन की
चंचल तितली
रस की रीत लिखे

सेमल, साल,
पलाश वनों में
भर सिन्दूर नहाते
महुवाए रतजगे बेचारे
भीम पलासी गाते
अलगोजे की तान पुरानी
परिणय-प्रीत लिखे
       
-रामकिशोर दाहिया

नाक के नीचे

-रामकिशोर दाहिया
जली आग में
घी मतलब का
करता काम निरे अड़भंगे
चीख पुकारें
दाब रहे हैं
ऊँचे स्वर के हर हर गंगे

कहाँ सुरक्षा
अपनी खोजें
कर्फ्यू लिये रात-दिन घर में
भूखे-लांघे
खा लेते हैं
लाठी, डंडा, जूता सर में
गली, घाट,
सड़कों पर बेसुध
पड़े लाश ले खूनी दंगे

अफरी मेड़
खेत को चरकर
पागुर करे नाक के नीचे
फिरे आबरू
भीख मांगती
देखे संसद आँखें मीचे
गिरे गगन
या गोली चीरे
न्याय माँगना भूखे नंगे

-रामकिशोर दाहिया