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Sunday, January 03, 2016

मुझसे नहीं रहा जाता है

[ आठ ]


बिना तुम्हारी
छवि को देखे,
मुझसे नहीं रहा जाता है

केवल प्राण बना देने से
काम अगर
चल जाता विधि का
तो करता क्यों
सृजन बताओं इतनी
अनुपम
तन की निधि का

कोई कहे
रूप को माटी
मुझसे नहीं कहा जाता है

मेरे तन,मन,प्राण
एक है मैं
न कर
सकूँगा बँटवारा
जिससे भी सम्भव
होता हो
बड़ी खूशी से
करे किनारा

बिन जल की
नदिया में मुझसे,
बिलकुल नहीं बहा जाता है

है ज़रूर
प्राणों औ छवि में
समझौता
कोई आपस में
एक बार जो
रूप निहारे रह न
जाये फिर अपने बस में

जिन बाहों से
गहा गुणी को,
निर्गुण नहीं गहा जाता है

-डॉ.शिवबहादुर सिंह भदौरिया

लय न टूटे देखिएगा

[ सात ]

-डॉ.शिवबहादुर सिंह भदौरिया

गुनगुनाती जिंदगी की
लय न टूटे
देखिएगा

यह न हो, लोहा हमारे
सगे रिश्ते तोड़ दे
भूमि की
हरियालियों को
मरुस्थलों में छोड़ दें

रंग-रस मय मधुर
वृन्दावन न छूटे
देखिएगा

तोड़ दरवाजे कहीं
घर में न फिर
अन्धड़ धँसे
खिलखिलाकर
आंगनों में
प्रेत का साया हँसे

द्वेष-दानव एकता का
धन न लूटे
देखिएगा

बंदरों के हाथ में
सद्ग्रन्थ
के पन्ने पड़े
दाढ़ में गंगाजली को
दाबकर कुत्ते लड़ें

शंख, घण्टा
आस्था का घट न फूटे
देखिएगा

         

दुर्दिन महराज

[ छः ]
-डॉ.शिवबहादुर सिंह भदौरिया

ड्योढ़ी
ऊपर फिर दुर्दिन
महराज विराजे

गेहूँ दबे
दाढ़ में ऋण की धान
बाढ़ की भेंट हुए
उम्मीदों के
बेटा-बेटी
ओढ़ पिछौरी लेट गए

मुँह लटकाए
गहने पहुँचे
बंधक के दरवाजे

वत्सल छाती को
तीखी-सी
एक छुरी की धार मिली
पिता-पुत्र के
बँटवारे में
आँगन को दीवार मिली

मिला मोतियाबिंद
सास के
आँख बहुरिया आंझे

पूजा के
कमरे में लाठी
आतंकित हो भजन भजे
ओसारे दहलीज
दुआरे सो-सो कर
कटु वचन,जगे

खींचा-तानी
मनमुटाव
के ढोल-नगाड़े बाजे

   

यहां सब चलता है

[ पांच ]

-डॉ.शिवबहादुर सिंह भदौरिया

अनुचि हो या उचित
यहाँ सब चलता है
चिल्लाता है
वही कि-
जिसका घर जलता है

माना कि धर्म
काटों के बाँट नकली हैं
लेकिन बन्धु!
वस्तुएँ क्या असली हैं

तकरीबन सबके
हाथ में जाल है
गौरतलब यह कि
कौन किससे फँसता है

भरे पेटों की
कुशलता ने हथिया ली
त्रासदी छिपाने की
तकनीक-व-प्रणाली

पिछली दुर्घटनाएँ
नेपथ्य में गईं
ताज़ाखबरों
से परिदृश्य बदलता है

झोपड़ियों की
रकम,पाण्डालों ने हड़पी
जीना
दूभर हुआ
एक जुबान तड़पी

संगीन व
अपराध है
प्रतिरोध में प्रमाद
विकलांग-भविष्य
कभी किसी
को छमा नहीं करता है

         

जेठ दुपहरी

[ चार ]

 -डॉ.शिवबहादुर सिंह भदौरिया

जेठ दुपहरी
हवा न ढुलके
गीत अगीत हुए पिडकुल के

ऊसर ठुठइल खेत लांघते
थके हिरन के पॉव खोजते
गहबर
छापक पेड़ छिउल के

प्यासे राही खाली छूँछे
मांगे लोटा-डोर न पूंछे
भइया !
कौन जाति किस कुल के

खड़े नसेड़ी उझके ताकें
हड़िया बंधी ताड़ की साखें
गिने न-पाप
दोख भूभुल के

पनही लगे पुजाने कोहबर
पूरी देह हँसे गुलमोहर
आँगन चुहल
चली खुल-खुल के

परवशता के खेल खिलौने

[ तीन ]

-डॉ.शिवबहादुर सिंह भदौरिया 
कभी कर्ज के,
कभी फर्ज के,
बोझ उठाये बड़े बड़े

तनिक सायानी हुई
कि"गौरा" चूल्हा-चौका हाथ लिए है
बासन मांजे,
कंडे पाथे चकिया छोड़ी,
जाँत लिए है
रोज नदी से
जल भर लाती
सिर पर दो-दो धरे घड़े

उधर नियम से बाँग लगाए
नित्य सुबह मस्जिद का मुल्ला
अपने मुँह बह बूदी हाँके
खटिया पकड़े इधर निठल्ला
कितनी है मजबूत
कि पति के,
नित सहती कटु बचन कड़े

इधर-उधर जब पड़े दृष्टियाँ
दिखें गले में बंधी घण्टियाँ
सबके अपने-अपने कोल्हू
किसकी खोले कौन पट्टियाँ
परवशता के
खेल खिलौने,
देखा करती खड़े खड़े

     

हवा बड़ी बदजात

[ दो ]

-डॉ.शिवबहादुर सिंह भदौरिया

कोई राग
न बूझे मिलता
बजे बेसुरी तांत

टंगे अलगनी
के कपड़ों को
गन्दी नाली में पहुँचाया
फेंक गई
कूड़ा आँगन में
खुली खिड़कियों को
हड़काया
अस्त-व्यस्त
कर गई वस्तुएँ
हवा बड़ी बदजात

नई व्यवस्था
तुझे बधाई
नस्ल दबंगों की उपजाई
तेरी पुण्य
कोख से उपजे
कर्ज-कमीशन जुड़वा भाई
सुविधा-शुल्क
लिए बिन दफ्तर
करें न मुँह से बात

अनुदानों के
छत्ते काटे
आपस में अमलों ने बाँटे
ग्राम विकास
बही खाते में
दर्ज हुए घाटे ही घाटे
थोडा उठे
गिरे फिर होरी
धंसे अठारह हाथ
       

पक्के घर में कच्चे रिश्ते

[एक]

-डॉ शिवबहादुर सिंह भदौरिया

पुरखा पथ से
पहिये रथ के
मोड़ रहा है गाँव

पूरे घर में
ईंटे पत्थर
धीरे-धीरे
छानी-छप्पर
जोड़ रहा है गाँव

ढीले होते
कसते-कसते
पक्के घर में
कच्चे रिश्ते
जोड़ रहा है गाँव

इसको उससे
उसको इससे
और न जाने
किसको किससे
तोड़ रहा है गाँव

गर्मी हो बरखा हो
या जाड़ा
सबके आँगन
एक अखाड़ा
खोद रहा है गाँव