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Wednesday, December 30, 2015

मेरी माँ

-चित्रांश वाघमारे


नटनी सी , पतली रस्सी पर
चलती रहती मेरी माँ ॥

उसको ध्यान रहा करता है
छोटी छोटी बातों का,
उसमे बसता है सोंधापन
सारे रिश्ते नातों का ।

बुआ ,बहन, भौजाई सब में-
ढलती रहती मेरी माँ ॥

मिसरी  बनकर वही घुली  है
खारी  सी तकरारों में,
भरती  अपनेपन की मिट्टी
उभरी हुई दरारों में ।

घर भर के घावों पर मरहम
मलती  रहती मेरी माँ ॥

आँचल के बरगद के नीचे
तपती धूप  नहीं आती,
सारे जगभर की शीतलता
माँ की गोदी की थाती ।

झीने से आँचल से पंखा
झलती रहती मेरी माँ ॥

आशय बदल रहे है अपने
सचमुच नेकी और बदी,
सच्ची बाते झुठलाती है
ऐसी अंधी हुई सदी ।

जग के झूठेपन में सच्ची
लगती रहती मेरी माँ ॥

सुनती है माँ, नई हवा के
चाल चलन कुछ ठीक नहीं,
जिस पर बढ़ते पाँव समय के
कोई अच्छी लीक नहीं ।

सोता है संसार रात-भर-
जगती रहती मेरी माँ ॥

बसती है मेरी माँ, मेरी -
अपनी हँसी-ठिठोली में,
 चौखट के वंदनवारों में
आँगन की रंगोली में ।

आँगन के दीये सी दिप-दिप
जलती रहती मेरी माँ ॥

  -चित्रांश वाघमारे

कैसे तलाशें छाँव

-चित्रांश वाघमारे


हर तरफ केवल तपन
कैसे तलाशें छाँव ॥

झेलती है हर कली
अब द्रौपदी सी,
मौसमी दुःशासनों के
घाव गहरे ।
पेड़ छलनी हो गया
शाखा विकल है,
हर कहीं पर घाव के
कुछ बिम्ब उभरे ।

नागफनियाँ उग रहीं है
मालती के गाँव ॥

राजपथ पर
स्वर्ण का मेला लगा है,
तृप्त होती
राजकोषों की पिपासा ।
टेरती पगडंडियाँ जब
राजपथ को
दे रहे कौटिल्य सब -
केवल दिलासा ।

हारती पगडंडियाँ ही -
पांडवों सी दाँव ॥

अब चतुर्दिक
धुंध छाई है शहर में,
एक भी अपनत्व वाला
स्वर नहीं है ।
गाँव के भी
व्याकरण बदले हुए है
 शोर में, संगीत में -
अंतर नहीं है ।

आज शीतलता नहीं है
बरगदो के ठाँव ॥

    -चित्रांश वाघमारे

छंद गिरवी रख दिए है

-चित्रांश वाघमारे

आओ कलमकारों उठो अब
गीत की गरिमा बचाओ,
भूख से टूटी कलम ने
छंद गिरवी रख दिए है ॥

है कहाँ अवकाश अब
कवि क्यों समय से द्वंद्व ठाने,
ढूँढ़ते है अब सभी जन –
कोष भरने के बहाने ।

बुझने लगे है वे दिए जो
पूर्व में बाले हुए है,
और हमने पूर्व के –
अनुबंध गिरवी रख दिए है ॥

अब निराला भी नहीं है
है नहीं दिनकर कही पर,
मंद पड़ती काव्यधारा –
ढल रहे है कोकिला स्वर ।

झरने लगे है पुष्प सारे
वाटिका मिटने लगी है,
और हमने पूर्व के –
मकरंद गिरवी रख दिए है ॥

शब्द बोझिल अर्थवाली
उलझनों में खो गए है,
शब्द है बोझिल यहाँ या –
अर्थ बोझिल हो गए है ?

अर्थ छीने, भाव छीने
शब्द से पर्याय छीने,
 मूल्य देकर शोक का –
आनंद गिरवी रख दिए है ॥

     -चित्रांश वाघमारे

राम खो गए दंडक वन में

-चित्रांश वाघमारे

ढूँढू कहाँ, कहाँ से पाऊँ ?
विश्वामित्र पड़े उलझन में
राम खो गए कहीं अचानक
घने,अँधेरे दंडक वन में

केवट की नौका गंगा के
पार अभी तक लगी नहीं है
जीवित है  मारीच सुबाहू
अभी दिव्यता जगी नहीं है
सहमी हुई हवा बहती है
पंछी है भयभीत विजन में

घर घर में होती रहती है
सीता - सी नारी की निंदा,
पाँव पसारे लंका नगरी
बेबस लगती है किष्किंधा
बाट अहिल्या जोह रही है
कब से भरकर प्राण नयन में

समय यहाँ हनुमान सरीखा
प्रतिबंधों में कसा हुआ है
आज अवध के सिंहासन पर
दशकंधर ही बसा हुआ है
निर्वासित होती सज्जनता
दानव बसते देव-सदन में

सदियों पहले जो होता था
नई सदी की कथा वही है,
अब भी अहंकार की माया -
तिल भर को भी झुकी नहीं है
फिर कोई दशरथ व्याकुल है,
कैकेयी फिर कोप भवन में

पर युग के अपरूप वृक्ष पर
कभी सुदर्शन पुष्प खिलेंगे
सबकी साध साधेगी सबको
अपने अपने राम मिलेंगे
राम न दिखते बाहर, इनको
सदा खोजना अंतर्मन में

     -चित्रांश वाघमारे

गुनगुनाना तक मना है

-चित्रांश वाघमारे

तार वीणा के कसो मत
गुनगुनाना तक मना है
भीड़ में अनुयायियों की
हो सको शामिल तो ठीक
चुप खड़ी परछाईयों में
हो सको शामिल तो ठीक
है कठिन पहरा अधर पर
शब्द लाना तक मना है

मूल है  कोई नहीं बस
मूल के पर्याय हम
ग्रंथ के रसवंत लेकिन
अनसुने अध्याय हम
कौन उच्चारण करे जब,
बुदबुदाना तक मना है

ज्योति की उजली सभा में
तिमिर अभ्यागत बने,
खुद यहाँ आकर, अमा का
सूर्य शरणागत बने
है गहन तम,पर दियों का
टिमटिमाना तक मना है

हो भला कैसे यहाँ
दो चार बातें चैन की,
कुछ कथाएँ शोक,सुख की
कुछ व्यथा दिन रैन की
अट्टहासों के नगर में
मुस्कुराना तक मना है

    -चित्रांश वाघमारे

अम्मा पत्थर तोड रही है

 -चित्रांश वाघमारे

देह पसीने से भीगी पर
फिर भी चमक निराली लेकर
रोज लौटती है बच्चो तक
रोटी लेकर थाली लेकर
टूट गयी है भीतर से पर
तिनका इनका जोड़ रही है

धरती हुई आग की भट्टी
दोपहरी की तेज़ धूप  है
पर अम्मा की काया जैसे
तपकर निखरा हुआ रूप है
अपनी साध साधती अम्मा
मौसम को झिंझोड़ रही है

अम्मा को मौसम की चिंता
नए समय की फ़िक्र अलग है
पर माँ घर-आँगन से रखती
इस चिंता का ज़िक्र,अलग है
हंसकर पल भर में ही अम्मा
सारी फ़िक्र निचोड़ रही है

पर अम्मा को थोड़ा दुख है
मन में अब भी कसक बची है
सोच रही माँ नए समय ने
 कैसी नयी बिसात रची है
भोली नई-नई सी नस्लें
लीक पुरानी छोड़ रही है

अम्मा घर की रानी जैसी
बच्चो की गुड़-धानी जैसी
मुस्कानों, खिलखिलाहटों की
उजली हुई कहानी जैसी
आँचल के झोंके से अम्मा
वेग हवा के मोड़ रही है

  - चित्रांश वाघमारे

बंद खिड़कियों जैसा मन है

कोई तो सांकल खटकाए
बंद खिड़कियों जैसा मन है

अन बोला ही बना हुआ है
खुद से ही ना जाने कब से
हम छिपने के ढूंढ रहे है
कितने नए बहाने कब से

खुद के ही प्रतिपक्षी है हम
खुद से ही अपनी अनबन है

अपने ही भटकावों का खुद
हमको ही अनुमान नहीं है
इस घर में बाकी सबकुछ है
केवल रौशनदान नहीं है

धूप नही देखी है कब से
पैठ गयी अंदर ठिठुरन है

खुद से ही स्पर्धा करते है
खुद से पीछे छूट रहे है
कद में बौने हुए जा रहे
इतने ज़्यादा टूट रहे है

होंठो पर संवाद  नहीं है
मौन हो गए सम्बोधन है

गांठे मन की खुले, घरौंदे
आपस में बोले, बतियाए
सब की छत पर थोड़ी-थोड़ी
उजली धूप उतारकर आए

साध सधे प्यासी तुलसी की
इसी प्रतीक्षा में आँगन है

- चित्रांश वाघमारे