-मुकुट सक्सेना
तुमने क्यों
खींच दी लकीरें
दर्पण पर
बिना अर्थ जानें?
क्वांरी अभिव्यक्ति के
हृदय से
यौवन का भार
तड़प रहा
मर्यादित छन्दों के
जाने उस पार
डालो मत
जंजीरें ऐसे क्षण
इच्छा के पाँव
कीलो मत
कीलों से
ठौर-ठौर
गीतों के गाँव
पल भर उड़ने दो
सपनों को
पंखों पर
नये क्षितिज पाने।
स्यानी
अभिलाष का
मनमोहक
मौन मुखर रूप
झुलासाए नहीं
कहीं चितकबरी
आषाढ़ी धूप
कुंजों में साधों की
छांह घनी
बैठो उस ओर
गाओ फिर
मेघ-राग प्यासे हैं
आशा के मोर
अभी और
रहने दो वंशी को
अधरों पर
गीत मधुर गाने !
-मुकुट सक्सेना
-मुकुट सक्सेना
रोज़ सुबह उगता जो
इन्द्रधनुष आँखों में
मैंने तो देखा है
तुमने भी देखा क्या ?
पीड़ा के जल में ही
शुभ्र कमल खिलते हैं
दुर्दिन के भौंरे
मकरन्द लिये मिलते हैं
जीवन का स्पंदन
फूल और परागों में
मैंने तो देखा है
तुमने भी देखा क्या?
इच्छा के मरुथल में
तृष्णा है अन्तहीन
खोज रहे तृप्ति मगर
पास नहीं दूरबीन
सरस्वती जल बहता
अब भी मरु के तल में
मैंने तो देखा है
तुमने भी देखा क्या?
सूर्य नित्य करता है
पृथ्वी पर हस्ताक्षर
और प्रकृति पढ़ती है
उसका हर-हर अक्षर
कालचक्र गतिमय है
क्षण-क्षण नव सर्जन हित
मैंने तो देखा है
तुमने भी देखा क्या ?
-मुकुट सक्सेना