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Wednesday, January 13, 2016

बाजीगर बन गई व्यवस्था

[ एक ]

बाजीगर बन गई व्यवस्था
हम सब हुए जमूरे
सपने कैसे होंगे पूरे।

चार कदम भर चल पाए थे
पैर लगे थर्राने
क्लांत प्रगति की निरख विवशता
छाया लगी चिढ़ाने
मन के आहत मृगछौने ने
बीते दिवस बिसूरे।
सपने कैसे होंगे पूरे।

हमने निज हाथों से युग–
पतवार जिन्हें पकड़ाई
वे शोषक हो गए
हुए हम चिर शोषित तरुणाई
'शोषण'दुर्ग हुआ अलबत्ता–
तोड़ो जीर्ण कंगूरे।

वे तो हैं स्वच्छंद, करेंगे
जो मन में आएगा
सूरज को गाली देंगे
कोई क्या कर पाएगा
दोष व्यक्ति का नहीं
व्यवस्था में छल-छिद्र घनेरे।

मिला भेड़ियों को भेड़ों की
अधिरक्षा का ठेका
जिन सफ़ेदपोशों को मैंने
देश निगलते देखा
स्वाभिमान को बेच, उन्हें
मैं कब तक नमन करूँ रे।

बदल गए आदर्श
आचरण की बदली परिभाषा
चोर लुटेरे हुए घनेरे
यह अभिशप्त निराशा
बदले युग के वर्तमान को
किस विधि से बदलूँ रे।

-डा० जगदीश व्योम

गीत की गति

[ दो ]

कितना करो विरोध
गीत की गति को
कौन रोक पायेगा।

गीत मेड़ पर
उगी दूब है
जो अकाल में भी
जी लेती
गीत खेजड़ी की
खोखर है
जीवन-जल
संचित कर लेती
जब तक हवा
रहेगी ज़िन्दा
हर पत्ता-पत्ता
गायेगा।

गीतों में है
गंध हवा की
श्रम की
रसभीनी सरगम है।
गौ की आँख
हिरन की चितवन
गंगा का
पावन उद्गम है
जिस पल रोका गया
गीत को
सारा आलम
अकुलायेगा।

गीतों में
कबीर की साखी है
तुलसी की चौपाई है
आल्हा की अनुगूँज
लहरियों में
कजली भी लहराई है
गीत
समय की लहर
रोकने वाला
इसमें बह जायेगा।

-डा० जगदीश व्योम

अपने घर के लोग

[ तीन ]

औरों की भर रहे तिजोरी
अपने घर के लोग।

सच कहना तो ठीक
मगर इतना सच नहीं कहो
जैसे सहती रही पीढ़ियाँ
तुम भी वही सहो
आज़ादी है, बोलो
लेकिन"कुछ भी"मत बोलो
जनता के मन में
सच्चाई का विष मत घोलो
नियति-नटी कर रही सदा से
ऐसे अज़ब प्रयोग।

राजा चुप
रानी भी चुप है
चुप सारे प्यादे
सिसक रहे सब
सैंतालिस से पहले के वादे
घर का कितना माल-ख़जाना
बाहर चला गया
बहता हुआ पसीना
फिर इत्रों से छला गया
जो बोला, लग गया उसी पर
एक नया अभियोग।

सहम गई है हवा
लग रहा आँधी आयेगी
अंहकार के छानी-छप्पर
ले उड़ जायेगी
भोला राजा रहा ऊँघता
जनता बेचारी
सभासदों ने
कदम-कदम पर की है मक्कारी
कोई अनहद उठे
कहीं से, हो ऐसा संयोग।

-डा० जगदीश व्योम

हम पलाश के वन

[ चार ]


ये कैसी आपाधापी है
ये कैसा क्रंदन
दूर खड़े चुप रहे देखते
हम पलाश के वन।

तीन पात से बढ़े न आगे
कितने युग बीते
अभिशापित हैं जनम-
जनम से हाथ रहे रीते
सहते रहे ताप, वर्षा
पर नहीं किया क्रंदन
हम पलाश के वन

जो आया उसने धमकाया
हम शोषित ठहरे
राजमहल के द्वार, कंगूरे
सब के सब बहरे
करती रहीं पीढ़ियाँ फिर भी
झुक-झुक अभिनंदन
हम पलाश के वन।  

धारा के प्रतिकूल चले हम
जिद्दीपन पाया
ऋतु वसंत में नहीं
ताप में पुलक उठी काया
चमक-दमक से दूर
हमारी बस्ती है निर्जन
हम पलाश के वन।

डा० जगदीश व्योम

ये जंगल एक अजूबा है

] पांच ]

तोते से मैना
यूँ बोली
ये जंगल एक अजूबा है

टहनी
शाखाओं से
लड़ती पत्ते
आपस में जूझ रहे
बूढ़ी जड़
मिट्टी से चिपकी
अपनी पीड़ा को
मौन गहे
खो गये कहाँ
सब संस्कार
अब आगे
क्या मंसूबा है।

सबके अपने-अपने
दल हैं, हर दल
दलदल में धँसा हुआ
वैसे तो चेहरों पर
लाली पर गला
सभी का फँसा हुआ
यूँ तो है
चहल-पहल लेकिन
मन सबका
डूबा-डूबा है।

भेड़ों ने आपस में
मिलकर अपना
प्रतिनिधि
इस बार चुना
रह गई धरी की
धरी चाल
स्यारों को
सबने खूब धुना
पर, खेल वही
सब ज्यों का त्यों
ये कैसा
‘व्योम’ अजूबा है।

भेड़ें आपस में
भिड़ बैठीं, हो गईं
खूब गुत्थमगुत्था
अब भेड़-भेड़िये के
भ्रम में है प्रश्नचिह्न
फिर अलवत्ता
है कौन भेड़
भेड़िया कौन
अब तक न
किसी को सूझा है।

-डा० जगदीश व्योम

हसिंगार झरे

[ छ: ]


सारी रात
महक बिखराकर
हरसिंगार झरे।

सहमी दूब
बाँस गुमसुम है
कोंपल डरी-डरी
बूढ़े बरगद की
आँखों में
खामोशी पसरी
बैठा दिए गए
जाने क्यों
गंधों पर पहरे।

वीरानापन
और बढ़ गया
जंगल देह हुई
हिरणी की
चंचल-चितवन में
भय की छुईमुई
टोने की ज़द से
अब आखिर
बाहर कौन करे।

सघन गंध
फैलाने वाला
व्याकुल है महुआ
त्रिपिटक बाँच रहा
सदियों से
पीपल मौन हुआ
चीवर पाने की
आशा में
कितने युग ठहरे।

-डा० जगदीश व्योम

भगीरथ कहाँ गये

[ सात ]

गंगा बहुत उदास
भगीरथ कहाँ गये

लहरों ने
अपने तट खोए
तट लगते अब
रोये रोये
कूड़ा, कचरा
नाली, नाला
सब कुछ है
गंगा में डाला
हम इतने बेशर्म
इसी को
कहते रहे विकास
भगीरथ कहाँ गये

हम बेहद
हो गए सयाने
पाप किए
जाने-अनजाने
सदियों जिसने
हमको पाला
हमने उसको
विष दे डाला
झेल रही
अपनी संतति का
अभिशापित संत्रास
भगीरथ कहाँ गये

कहाँ गए
अनुबंध पुराने
यह तो कोई
भगीरथ जाने
सगर पुत्र
फिर से अकुलाये
गंगा कौन
बचाकर लाये
पूछ रहे
जन-जन के मन से
गंगा के उच्छ्वास
भगीरथ कहाँ गये

-डा० जगदीश व्योम