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Sunday, August 05, 2018

शिव बहादुर सिंह भदौरिया [डा०] के नवगीतों पर टिप्पणी

वैसबारा की माटी में कुछ ऐसी खासियत है कि वहाँ साहित्य की फसल कुछ ज्यादा ही लहलहाती रही है। एक दो बार उधर जाने का अवसर मुझे भी मिला है। डलमऊ से लेकर रायबरेली तक जो कुछ लोक में बिखरा पड़ा है उसे डा० शिव बहादुर सिंह भदौरिया के नवगीतों को पढ़कर महसूस किया जा सकता है। उनके नवगीतों में वैसबारा की संस्कृति, वहाँ की लोक शब्दावली, वहाँ प्रचलित ठेठ शब्द जिस खास ठसक के साथ आते हैं वैसा अन्यत्र कम ही देखने को मिलता है। लगता है उन्होंने अपने नवगीतों में एक एक बात शोध कर करके लिखी है चाहे वह गाँव के चित्रण हों या राजनीति की बातें अथवा कतिपय अनुभूतियों के चित्रण... सब कुछ अनूठा-सा सब कुछ मौलिक-सा। और खास बात यह भी कि अपने उत्तराधिकारी के रूप में विनय भदौरिया जैसा नवगीतकार भी सौंपा है उन्होंने साहित्य जगत को। वे अपने नवगीतों के मिस हमेशा हमेशा याद किये जाते रहेंगे कभी रामकिशोर दाहिया के बहाने तो कभी किसी और के बहाने।

-डा० जगदीश व्योम

Sunday, March 06, 2016

डा० जगदीश व्योम

== नईम जी के नवगीतों पर टिप्पणी ==
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जिस प्रकार मालवा की माटी और वहाँ की आबोहवा को महसूस किया जा सकता है उसका वर्णन कर पाना मुश्किल है ठीक उसी तरह से नईम जी के नवगीतों को पढ़कर जो सुखद अनुभूति होती है उसे हूबहू कह पाना या लिख पाना बड़ी चुनौती है।  नईम जी के नवगीत आदर्श नवगीत हैं। उनकी भाषा एक अलग तरह का अहसास कराती है, वे मात्राएँ या वर्ण गिन गिनकर नवगीत नहीं लिखते बल्कि मात्राएँ नईम जी के नवगीतों में अपने आप फिट बैठती जाती हैं, लय और प्रवाह ऐसा कि मानो रेवा का प्रवाह हो, कथ्य इतना मौलिक और इतना प्रभावशाली कि नईम का नवगीत पढ़ने के बाद कई कई दिन तक चेतन और अवचेतन में वही और सिर्फ वही गूँजता रहता है। नईम के नवगीतों को संगीत के साथ गाओ, पहाड़ पर गुनगुनाओ, आदिम वस्ती में पढ़ो या नगरों, महानगरों में बाँचो..... सब जगह प्रासंगिक सब जगह लोकप्रिय..... यही है नवगीत की पहचान और यही है नवगीत की सफलता का रहस्य..... और यही वह बिन्दु है जहाँ नईम और नवगीत दोनों मिलकर एक हो जाते हैं, एकाकार हो जाते हैं....... ऐसा लगता है कि नईम अपने नवगीतों के आखर आखर में बिखर कर फिर फिर हमारे साथ आते रहते हैं...........

-डा० जगदीश व्योम

Tuesday, January 12, 2016

डॉ रविशंकर पाण्डेय के नवगीत

डॉ  रविशंकर  पाण्डेय  के  नवगीत  सामाजिक  विद्रूपताओं  को बहुत  निकट  से जांच  परख  कर सहज भाषा में लिखे गए  नवगीत  हैं,  वधाई  डॉ  पाण्डेय जी  को  और  प्रस्तुत  करने के लिए  दाहिया जी को  धन्यवाद
-डॉ जगदीश व्योम