Friday, June 24, 2016

रीते घट सम्बंध हुए

-संध्या सिंह

सूख चला है जल जीवन का
अर्थहीन तटबंध हुए
शुष्क धरा पर तपता नभ है
रीते घट सम्बंध हुए

संदेहों के कच्चे घर थे
षड्यंत्रों की सेंध लगी
अहंकार की कंटक शैया
मतभेदों में रात जगी
अवसाद कलह की सत्ता में
उत्सव पर प्रतिबन्ध हुए

ढाई आखर वेद छोड़ कर
हम बस इतने साक्षर थे
हवन कुंड पर शपथ लिखी थीं
वादों पर हस्ताक्षर थे
रस्म रिवाजों की शर्तों पर
कच्चे सब अनुबंध हुए

-संध्या सिंह

ये कैसे बंटवारे गम के

-संध्या सिंह

घाव दर्द मुस्कान ठहाके
मिले धरा पर बिना नियम के
कैसी ये तकसीम सुखों की
कैसे ये बंटवारे गम के

कहीं अमीरी के बक्से में
सोना-सोना ख़्वाब धरे हैं
कहीं फटी किस्मत का पल्लू
सिक्का-सिक्का स्वप्न मरे हैं  
जहाँ किश्त पर नींद मिली हो
वहीं फिक्र के डाकू धमके

कहीं कुतर्कों से ‘आज़ादी‘
रोज़ नयी परिभाषा लाती
कहीं रिवाजों के पिंजरे में
चिड़िया पंख लिए मर जाती
जहाँ भूख से आंत ऐंठती
वहीं पहाड़े हैं संयम के

जहाँ लबालब नदिया बहती
वहीं बरसते बादल आ कर
जहाँ धरा की सूखी छाती
धूप बैठती पाँव जमा कर
जहाँ थकी हो प्यास रेत में
वहीं भरम का पानी चमके

-संध्या सिंह

नहीं मील का पत्थर कोई

-संध्या सिंह 

कितनी दूर चले हैं जाने
कैसे जीवन पथ पहचाने
नहीं मील का पत्थर कोई
दिखा सफ़र में गड़ा हुआ

खुशियाँ जंग लगे बक्से में
बंद पोटली के भीतर
ताले लगे विवशताओं के
मुस्कानो पर कड़ी नज़र
सपना चारदीवारी भीतर
पंजो के बल खडा हुआ

दंड मिला तितली को वन में
फूल फूल मंडराने पर
हवा स्वयं ही चुगली करती
शाखों के लहराने पर
पाबंदी के तंग शहर में
जंगल का मृग बड़ा हुआ

परिवर्तन ने पंख दे दिए
पर रस्मों ने डोर कसी
घर–बाहर के बीच जंग हैं
दरवाजे में देह फँसी
बहती गयी उमर नदिया-सी
मन जिद्दी-सा अड़ा हुआ

-संध्या सिंह

विडम्बना

 -संध्या सिंह

गहन उदासी के आँगन को
उत्सव दिखना था
बालू के पन्ने पर हमको
दरिया लिखना था

पथरीला सच पाँव तले था
मिट्टी के सपने सर पर
द्वेष ईर्ष्या के गड्ढों से
भरसक चले सदा बच कर
मगर जहाँ पर मिली ढलाने
रस्ता चिकना था

पंखों की सब रद्द उड़ाने
कुहरे का परिवेश मिला
बूँदों को काजल की हद में
रहने का आदेश मिला
घूम-घूम कर एक नोक पर
लट्टू  टिकना था

-संध्या सिंह

Sunday, March 06, 2016

हरा अँगरखा

-नईम
पीली पगड़ी, हरा अँगरखा
पहने खेत कपास के

कच्ची उम्र, मालवी दूल्हों
जैसे ये नन्हें पौधे
नज़र न धरती की लग जाए
बिजुरी बनजारिन कौंधे
भरी देह वस्त्रों न समाए
जीवन जिए समास के

चले आ रहे रूप लुटाते,
अगहन पूस के ये झोंके
पके ज्वार के खेत मड़ैया,
बेटे चढ़े किसानों के
रुके हुए रथ, साथ चल रहे
धरती के, आकाश के

स्वजन बाराती उड़द साँवले,
मक्की मूँगा तिलक करे
लिपे-पुते घर पनहारिन ये
धूप नदी-तट कलश भरे
अरहर ने पग पायल पहनी
गाए गीत उजास के

-नईम 

फंदा ढीला है

-नईम
जोड़-जोड़ गठिया का मारा
मौसम सीला है

खोलूँ जब तक, दुष्ट हवाओं ने
जड़ दिए किवाड़
काटूँ कैसे? शस्त्र भोथरे
ये पल हुए पहाड़
खूँटे से बँध गया हर
कदम चुभता कीला है

साँझ बसाई बस्ती जो
यह सुबह उजड़ जाए
किसे पुकारूँ, पता नहीं
कब साँस उखड़ जाए
डोरे नहीं, गुलाबी रंग
आँखों का पीला है

भूल-चूक, लेनी-देनी जो
कहा-सुना हो माफ
हर दुकान पर पाए मैंने
कद से ओछे माप
फाँसी से इनकार किसे
पर फंदा ढीला है

-नईम 

डा० जगदीश व्योम

== नईम जी के नवगीतों पर टिप्पणी ==
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जिस प्रकार मालवा की माटी और वहाँ की आबोहवा को महसूस किया जा सकता है उसका वर्णन कर पाना मुश्किल है ठीक उसी तरह से नईम जी के नवगीतों को पढ़कर जो सुखद अनुभूति होती है उसे हूबहू कह पाना या लिख पाना बड़ी चुनौती है।  नईम जी के नवगीत आदर्श नवगीत हैं। उनकी भाषा एक अलग तरह का अहसास कराती है, वे मात्राएँ या वर्ण गिन गिनकर नवगीत नहीं लिखते बल्कि मात्राएँ नईम जी के नवगीतों में अपने आप फिट बैठती जाती हैं, लय और प्रवाह ऐसा कि मानो रेवा का प्रवाह हो, कथ्य इतना मौलिक और इतना प्रभावशाली कि नईम का नवगीत पढ़ने के बाद कई कई दिन तक चेतन और अवचेतन में वही और सिर्फ वही गूँजता रहता है। नईम के नवगीतों को संगीत के साथ गाओ, पहाड़ पर गुनगुनाओ, आदिम वस्ती में पढ़ो या नगरों, महानगरों में बाँचो..... सब जगह प्रासंगिक सब जगह लोकप्रिय..... यही है नवगीत की पहचान और यही है नवगीत की सफलता का रहस्य..... और यही वह बिन्दु है जहाँ नईम और नवगीत दोनों मिलकर एक हो जाते हैं, एकाकार हो जाते हैं....... ऐसा लगता है कि नईम अपने नवगीतों के आखर आखर में बिखर कर फिर फिर हमारे साथ आते रहते हैं...........

-डा० जगदीश व्योम

Sunday, February 28, 2016

हद में ही पाँवों को मोड़ना

-अनिरुद्ध नीरव
हांफ-हांफ जाता हूँ
चार पंक्ति जोड़कर
जैसे चट्टान कोई तोड़कर

अपनी झीनी बीनी ओढ़ना
हद में ही पाँवों को मोड़ना
संख्यायें ऋण चिह्नों पर खड़ीं
सबको संचित धन-जोड़ना
स्वेद-स्वेद होता हूँ
स्वप्न को निचोड़ कर
जैसे चट्टान कोई तोड़कर

ध्वंसों की नदियों में वेग है
वेगों में पागल उद्वेग है
पागल उद्वेगों की हर लहर
कोई बरछी कोई तेग है
युद्ध-युद्ध होता हूँ
एक धार मोड़कर
जैसे चट्टान कोई तोड़कर

हर अंतर्वस्तु तार-तार क्यों
मिलकर मुर्दों का बाजार क्यों
गढ़ते है जो शब्दों की चिता
मरघट को कहते गुलजार क्यों
काँप-काँप जाता हूँ
एक शव झिंझोड़कर
जैसे चट्टान कोई तोड़कर
         
 -अनिरुद्ध नीरव
[पुनर्नवा विशेषांक 2016 से]

मजबूरी है

-रामकिशोर दाहिया
मजबूरी है
कविता लिखना
कलम बाँध कर लाठी से

लाठी देख
बँदरिया नाचे
अपना मालिक चीन्हे-जानें
रबर-सरीखे
लक्ष्य अकड़ को
जोर लगाकर खींचे-तानें
दंद-फंद को
बाहर करने
भिड़ा हुआ हूँ कद-काठी से

संवेदन को
जीना होगा
तोड़ रही दम आशा छोटी
शक्ल आदमी की
है लेकिन
खून पिये औ' छीने रोटी
सुअर खाल पर
शब्द व्यंजना
ताकतवर हो तन माटी से

दूध-मलाई
मक्खन खाते, जिसकी
लाठी भैंस उसी की
फ़कत सिपाही
रहे कलम के, किये
नहीं कम पीर किसी की
बेहतर अलग
हो जाना चाहूँ
निर्बल की परपाटी से
     
-रामकिशोर दाहिया

रस की रीत लिखे

-रामकिशोर दाहिया

बिंदिया, कँगना,
पायल, बिछुआ,
प्रणय अतीत लिखे
फूलों की पंखुरियों पर
फागुन ने गीत लिखे

रंगों की मादकता उस पर
छन्दों के अनुबन्ध
कहने को आतुर हैं
अपने-अपनों के सम्बंध
पत्र-प्रेयसी को चोरी से
ज्यों मनमीत लिखे

भौंरों की अनुगूँज फूल के
कानों में अनुप्रास
भीतर-भीतर लगा कसकने
मदिराया मधुमास
मन-आँगन की
चंचल तितली
रस की रीत लिखे

सेमल, साल,
पलाश वनों में
भर सिन्दूर नहाते
महुवाए रतजगे बेचारे
भीम पलासी गाते
अलगोजे की तान पुरानी
परिणय-प्रीत लिखे
       
-रामकिशोर दाहिया