-चित्रांश वाघमारे
गुनगुनाना तक मना है
भीड़ में अनुयायियों की
हो सको शामिल तो ठीक
चुप खड़ी परछाईयों में
हो सको शामिल तो ठीक
है कठिन पहरा अधर पर
शब्द लाना तक मना है
मूल है कोई नहीं बस
मूल के पर्याय हम
ग्रंथ के रसवंत लेकिन
अनसुने अध्याय हम
कौन उच्चारण करे जब,
बुदबुदाना तक मना है
ज्योति की उजली सभा में
तिमिर अभ्यागत बने,
खुद यहाँ आकर, अमा का
सूर्य शरणागत बने
है गहन तम,पर दियों का
टिमटिमाना तक मना है
हो भला कैसे यहाँ
दो चार बातें चैन की,
कुछ कथाएँ शोक,सुख की
कुछ व्यथा दिन रैन की
अट्टहासों के नगर में
मुस्कुराना तक मना है
-चित्रांश वाघमारे
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