-डॉ० सुभाष वसिष्ठ
हम पर फिर नहीं
क्या विधाता का नियम
युग गुज़ारा खेत में
हमवार करते जड़ ज़मीं
लू, पसीना, हाथ गाँठें
कण्ठ सूखा डर नहीं
फसल पर
हर बार कम
एक मौसम रिक्त हो तो
क्या शिकायत, क्या गिला
ज़िन्दगी तक झोंकने का
सिर्फ़ सूखा ही सिला
साँस रोके
जिये दम
देखते हैं कब तलक
मरुभूमि पर चलते हुए
बिन छतर, बिन मेघ के
अहसास तक जलते हुए
आचमन को
सिर्फ ग़म
-डॉ० सुभाष वसिष्ठ
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