[ चार ]
जेठ दुपहरी
हवा न ढुलके
गीत अगीत हुए पिडकुल के
ऊसर ठुठइल खेत लांघते
थके हिरन के पॉव खोजते
गहबर
छापक पेड़ छिउल के
प्यासे राही खाली छूँछे
मांगे लोटा-डोर न पूंछे
भइया !
कौन जाति किस कुल के
खड़े नसेड़ी उझके ताकें
हड़िया बंधी ताड़ की साखें
गिने न-पाप
दोख भूभुल के
पनही लगे पुजाने कोहबर
पूरी देह हँसे गुलमोहर
आँगन चुहल
चली खुल-खुल के
-डॉ.शिवबहादुर सिंह भदौरिया
जेठ दुपहरी
हवा न ढुलके
गीत अगीत हुए पिडकुल के
ऊसर ठुठइल खेत लांघते
थके हिरन के पॉव खोजते
गहबर
छापक पेड़ छिउल के
प्यासे राही खाली छूँछे
मांगे लोटा-डोर न पूंछे
भइया !
कौन जाति किस कुल के
खड़े नसेड़ी उझके ताकें
हड़िया बंधी ताड़ की साखें
गिने न-पाप
दोख भूभुल के
पनही लगे पुजाने कोहबर
पूरी देह हँसे गुलमोहर
आँगन चुहल
चली खुल-खुल के
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