[ छः ]
ड्योढ़ी
ऊपर फिर दुर्दिन
महराज विराजे
गेहूँ दबे
दाढ़ में ऋण की धान
बाढ़ की भेंट हुए
उम्मीदों के
बेटा-बेटी
ओढ़ पिछौरी लेट गए
मुँह लटकाए
गहने पहुँचे
बंधक के दरवाजे
वत्सल छाती को
तीखी-सी
एक छुरी की धार मिली
पिता-पुत्र के
बँटवारे में
आँगन को दीवार मिली
मिला मोतियाबिंद
सास के
आँख बहुरिया आंझे
पूजा के
कमरे में लाठी
आतंकित हो भजन भजे
ओसारे दहलीज
दुआरे सो-सो कर
कटु वचन,जगे
खींचा-तानी
मनमुटाव
के ढोल-नगाड़े बाजे
-डॉ.शिवबहादुर सिंह भदौरिया
ड्योढ़ी
ऊपर फिर दुर्दिन
महराज विराजे
गेहूँ दबे
दाढ़ में ऋण की धान
बाढ़ की भेंट हुए
उम्मीदों के
बेटा-बेटी
ओढ़ पिछौरी लेट गए
मुँह लटकाए
गहने पहुँचे
बंधक के दरवाजे
वत्सल छाती को
तीखी-सी
एक छुरी की धार मिली
पिता-पुत्र के
बँटवारे में
आँगन को दीवार मिली
मिला मोतियाबिंद
सास के
आँख बहुरिया आंझे
पूजा के
कमरे में लाठी
आतंकित हो भजन भजे
ओसारे दहलीज
दुआरे सो-सो कर
कटु वचन,जगे
खींचा-तानी
मनमुटाव
के ढोल-नगाड़े बाजे
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